Saturday, 19 January 2019

A Spiritual Beginning - मेरे नैना सावन भादो, फिर भी है मन प्यासा

                                             "मेरे नैना सावन भादो, फिर भी है मन प्यासा"


पिछले चार दिनों में मेरा वो सपना पूरा हुआ जिसको नजाने मैंने अपने दिल में कब से संजोय रखा था | मैं रोज मंदिर जाता था और यह सोचता था की आज के इस युग के महावीर कैसे होंगे...वर्तमान के वर्धमान कैसे होंगे ?

फिर एक दिन एलाचार्य श्री १०८ अतिवीर महाराज ने कहा कि अगर तुम्हे वर्तमान के वर्धमान के दर्शन करने है तो आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी के दर्शन करो | बस जबसे मेरे मन में उनके दर्शन करने की एक ख्वाहिश ने अपना घर बना लिया जो समय के साथ साथ और बड़ा होता गया | मैंने उनके दर्शन करने के लिए कई बार प्रोग्राम बनाया पर किसी न किसी कारण वो हमेशा कैंसल हो जाता था|

फिर आखिरकार हमारा एक प्रोग्राम बना जिसके लिए मैं समीर जैन ,आयुष जैन,रिषभ जैन और आलोक जैन का अपने तहे दिल से शुक्रिया करना चाहूँगा कि उन्होंने इस प्रोग्राम को सच्चाई में परिवर्तित करने
में मेरी मदद की |

१२ अगस्त ,२०१२ के सुबह की बेला का वह पल जब मैंने पहली बार आचार्य श्री जी के साक्षात् दर्शन किये |
आचार्य श्री शौच से आ रहे थे | मैं उनके चरण स्पर्श करना चाहता था पर अफ़सोस कर नहीं पाया | पर एक झलक पाकर मैं खुश तो था पर मेरे मन की तृप्ति नहीं हुई |

फिर मैंने सोचा कि चलो अब आहार क्रिया के लिए तैयार हो जाऊं ,क्या पता कि मुझे उन्हें आहार देने का सौभाग्य प्राप्त हो जाये | मैं तैयार हो गया | अचानक आचार्य श्री आते है | ऐसा लगता है कि मानो हवा में एक अलग सी सुगंध वातावरण में फ़ैल गयी हो|

हर जगह एक स्वर में सिर्फ एक ही आवाज सुनने को मिली "हे स्वामी नमोस्तु " जो करीब ५ मिनट तक चली | इस ध्वनि को सुनकर ऐसा लगा कि मानो पूरे शरीर में एक अलग सी तरंग दौड़ पड़ी हो | सचमुच अदभुत था वह नजारा |पर अफ़सोस भीड़ जयादा होने कि वजह से मैं आचार्य श्री को आहार नहीं दे पाया | मेरे मन की तृप्ति फिर भी नहीं हुई |

फिर आहार क्रिया के बाद सामायिक करने के बाद करीब २ बजे आचार्य श्री जी ने अपने प्रवचन दिए| उनके प्रवचन सुनकर मन प्रफुल्लित हो उठा पर अभी भी उनके चरण स्पर्श करने की अभिलाषा मेरे मन में हिठ्खोले खा रही थी | जैसे ही प्रवचन सम्पूर्ण हुए हुए मैं जाकर सीढ़ियों पर जाकर खड़ा हो गया जहाँ से आचार्य श्री जी को जाना था और जैसे ही आचार्य श्री वहां आये मैंने चरण स्पर्श कर लिए| मैं बहुत खुश हो गया ऐसा लगा कि मानो मैं सातवें आसमान में हूँ |पर अगले ही पल एक और अभिलाषा मेरे मन में आने लगे कि कितना अच्छा होता कि आचार्य श्री जी एक बार हमसे बात कर लेते |


बस अगले ही पल मैं इसी कोशिश में जुट गया कि किसी तरह एक बार आचार्य श्री अपना आशीर्वाद दे दे और हमसे थोड़ी बात कर लें |भीड़ को देखकर यह अभिलाषा थोड़ी असंभव से प्रतीत होती थी पर मन में आत्मविश्वास था कि मेरी यह मंशा भी पूरी होगी | फिर मौका देखकर हम आचार्य श्री जी के पास चले गए और अपनी बात उनसे कही |उन्होंने ज्यादा तो कुछ नहीं कहा पर अपना आशीर्वाद हमें दे दिया | मन फिर से खुश हो गया |पर अब अगले ही पल ख्याल आने लगा कि कितना अच्छा होता कि रात को आचार्य श्री जी की वैयावृति करने को मिल जाएं |

फिर मैं रात होने का इन्तजार करने लगा पर अफ़सोस हम आचार्य श्री जी की वैयावृति नहीं कर पाएं |मन थोडा उदास हो गया पर अगले ही पल चल कोई नहीं कल पक्के से आहार दे दियो उन्हें | इसके बाद मैं यह प्रार्थना करने लगा कि जल्दी से यह रात कट जायें ताकि मन आहार दे सकूँ| पर भीड़ के कारण मैं अगले दिन भी उन्हें आहार नहीं दे पाया |मन बहुत उदास हो गया |

इसके बाद आचार्य श्री जी के प्रवचन थे | मैं प्रवचन सुनने बैठ गया | उनके प्रवचन सुनकर ऐसा लगा कि मानो वो मेरे मन कि बात जानते है और मुझे ही समझाने के लिए प्रवचन दे रहे है |उन्होंने कहा कि यह मन एक ऐसा घड़ा है जो कभी भी नहीं भर सकता | उन्होंने कहा कि लोग यहाँ आते है और कहते है कि मन नहीं भरा | उनका मन कभी भी नहीं भर सकता क्यूंकि यह मन है ही ऐसा घड़ा | मेरी समझ में आ गया कि वाकई में मेरे मन कि तृप्ति हो ही नहीं सकती |

पहले मैं एक झलक पाने को आतुर था,फिर चरण स्पर्श करने के लिए,फिर थोड़ी बात करने के लिए ,फिर आहार देने और वैयावृति करने के लिए| अगर मेरी साड़ी बहिलाषा पूरी भी हो जाती तब भी मेरा मन नहीं भरता क्यूंकि आचार्य श्री जी तो उस जल कि शीतलता कि तरह है जिसे खूब सारा पीने के बाद भी न तो कभी मन भर सकता है और न ही कभी उसकी जगह कोई और ले सकता है |

मेरे आँखों के सामने आचार्य श्री रूपी सावन-भादों थे पर फिर भी २ दिन मन प्यासा रहा ....पर इस बात की ख़ुशी है कि जातें जातें आचार्य श्री जी ने मेरी मन की प्यास को अपने प्रवचन की शीतलता से शांत कर दिया |
बस अंत में यह कहना चाहूँगा कि

पल पल से जिस पल का इंतजार था मुझे,
             वह पल आया भी तो कुछ पल के लिए,
                            सोचा था आँखों में बसा लेंगे उस पल को,
                                                     पर वह पल बसा भी तो कुछ पल के लिए...........

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